फूलों की तरह हमें सदा खिलना चाहिए, प्रेमभाव से हमेशा हमें मिलना चाहिए। ज़िंदगी तो चार दिन की जी भर जिएं, निःस्वार्थ भाव से परमार्थ करना चाहिए।

किसी को परेशान करना मेरी फ़ितरत नहीं, मेरी कोशिश है किसी के कुछ काम आ सकूँ अपनी ज़िंदगी तो सभी जीते हैं आराम से, मन से किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकूँ।

चला जो मैं अपनों के खिलाफ, तो उनके एहसान बीच में आ गए और की जो कुछ ख्वाइश मैंने, अपनों के अरमान बीच में आ गए सच – झूठ को जो तोल के देखा, तो सोचा की सच का साथ दू, पर मेरे अपनों के झूठ को बचाने, भगवान (संस्कार) बीच में आ गए

उड़ा जाता है चांद, छोर मिलता नहीं। खुशियों का चांद, अब खिलता नहीं। चांद का रंग रूप, कुछ अलग ढ़ंग का। अब चांदनी से चांद, कहीं मिलता नहीं।

मन के अंदर झांक रहा है मन मेरा। मन की भाषा बोल रहा है मन मेरा। मन भावों का एक समुंदर होता है। मन चंचल है घूम रहा है मन मेरा..।